ऊपरवाले के आगे विज्ञान फेल : कानपुर के जुड़वा बच्चों के फिंगर प्रिंट और रेटिना एक जैसा

ऊपरवाले के आगे विज्ञान फेल : कानपुर के जुड़वा बच्चों के फिंगर प्रिंट और रेटिना एक जैसा

– नौबस्ता में रहने वाला पिता एक बेटे का आधार बनवाता है तो दूसरे का निरस्त हो जाता है

The twins from Kanpur have identical fingerprints and retinas, JMN : उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में सामने आए एक अभूतपूर्व मामले ने वैज्ञानिक समुदाय और देश की बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली को गंभीर विचार के लिए मजबूर कर दिया है। यह मामला विज्ञान के उस मूलभूत सिद्धांत को चुनौती दे रहा है कि दुनिया में किन्हीं भी दो व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट और रेटिना स्कैन कभी एक जैसे नहीं हो सकते।

जुड़वा भाई प्रबल और पवित्र, जिनका रेटीना और फिंगरप्रिंट एक जैसे हैं।
जुड़वा भाई प्रबल और पवित्र, जिनका रेटिना और फिंगरप्रिंट एक जैसे हैं।

नौबस्ता निवासी पवन मिश्रा के जुड़वा बेटे प्रबल और पवित्र इस असाधारण घटना के केंद्र में हैं। उनके पिता के अनुसार, दोनों हमशक्ल भाइयों के बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, जिसमें फिंगरप्रिंट और रेटिना स्कैन शामिल हैं, आधार कार्ड अपडेट के दौरान हूबहू एक जैसे पाए गए हैं।

आधार प्रणाली में गतिरोध
इस ‘बायोमेट्रिक समानता’ के कारण परिवार को आधार कार्ड अपडेट कराने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पिता पवन मिश्रा ने बताया, “जब मैं एक बेटे के आधार में बायोमेट्रिक डेटा अपडेट कराता हूँ, तो सिस्टम तुरंत दूसरे बेटे का आधार कार्ड निरस्त (रिजेक्ट) कर देता है।” यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पहचान प्रणाली इन दोनों बच्चों को एक ही व्यक्ति मान रही है।

वैज्ञानिक बहस का विषय
साइंस के जानकार और फॉरेंसिक विशेषज्ञ इस घटना को भारत में अत्यंत दुर्लभ और संभवतः पहला मामला मान रहे हैं। सामान्य जुड़वा बच्चों के फिंगरप्रिंट पैटर्न में 55% से 74% तक समानता होना सामान्य माना जाता है, लेकिन उनका पूरी तरह से समान होना एक ऐसी विसंगति है, जिसके लिए गहन वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता है।

यह अनूठा मामला न केवल डीएनए और आनुवंशिकी के सिद्धांतों पर नए सिरे से विचार करने की मांग करता है, बल्कि आधार जैसी विशाल बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली की सीमाओं पर भी सवाल खड़े करता है, जिसके डिजाइन में ‘समान बायोमेट्रिक्स’ की संभावना को शायद ही कभी शामिल किया गया हो। प्रबल और पवित्र अब केवल दो बच्चे नहीं हैं, बल्कि वे उस असाधारण वैज्ञानिक रहस्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो ‘अद्वितीय पहचान’ की अवधारणा को एक नई दिशा दे सकता है।

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